क्या है यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC)? लागू करने के नाम पर क्यूं भड़क जाते हैं मुसलमान

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23 नवंबर 1948 को संविधान सभा से कॉमन सिविल कोड यानी आर्टिकल 44 पास हुआ था. अनुच्छेद 44 में कहा गया है कि शादी-विवाह की उम्र सबकी एक समान होनी चाहिए, हिंदू हो या मुसलमान, पारसी हो या ईसाई

‘एक देश एक कानून’ ये नारा हम बीते कुछ सालों से कई बार सुनते आ रहे हैं.
यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) या समान नागरिक संहिता इसी नारे का हिस्सा है. भारत में सभी धर्मों के लिए एक कानून की मांग की जा रही है. ऐसे में बवाल भी खूब मचा.

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मुस्लिम संगठन

मुस्लिम पक्ष लगातार इसके खिलाफ अपनी आवाज उठा रहे हैं. अलग अलग मुस्लिम संगठन के साथ राजनितिक पार्टी AIMIM प्रमुख असद्दुदीन ओवैसी भारत में यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) के लागू होने की बात पर भड़क उठ खड़े हो रहे हैं.

मुस्लिम संगठन के साथ AIMIM प्रमुख असद्दुदीन ओवैसी
केंद्र सरकार यूनिफॉर्म सिविल कोर्ड जल्द लाने की तैयारी में हैं

आपको बता दें की कयास लग रहे हैं की इस कानून का केंद्रीय बिल आने वाले समय में किसी भी समय संसद में पेश किया जा सकता है. परीक्षण के तौर पर उत्तराखंड में इस कानून के बनाने की कवायद शुरू की गई है जिसमें एक कमेटी का गठन कर दिया है.

केंद्रीय कानून मंत्रालय

वहीँ इस कमेटी के लिए ड्राफ्ट निर्देश बिन्दु केंद्रीय कानून मंत्रालय ने ही दिए हैं. इससे साफ है कानून का ड्राफ्ट केंद्र सरकार के पास बना हुआ है.

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सूत्रों के मुताबिक यह कानून अवश्य आएगा लेकिन कब और किस समय आएगा, यही सवाल है.

इससे पहले सरकार का इरादा था कि समान नागरिक संहिता पर राष्ट्रीय विधि आयोग से रिपोर्ट ले ली जाए लेकिन, विधि आयोग के 2020 में पुनर्गठन होने के बावजूद कार्यशील नहीं होने के कारण राज्य स्तर पर कमेटियां बनाई जा रही हैं.

कमेटी का फॉर्मेट विधि आयोग की तरह से ही है. इसमें सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस रंजना देसाई, दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज प्रमोद कोहली, पूर्व आईएएस शत्रुघ्न सिंह और दून विवि की वीसी सुरेखा डंगवाल शामिल हैं.

आपकी जानकारी के लिए बता दें की उत्तराखंड में यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) पर चर्चा की जा रही है.

उत्तराखंड मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी

इसी के साथ कयास लग रहे हैं की बहुत जल्द भारत में यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) कानून को लागू किया जायेगा जिसके लिए सरकार कभी कभी भी प्रस्ताव जारी कर सकती है.

ऐसे में सवाल उठता है की यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) को लेकर देश में बवाल क्यूं मचा हुआ है? इस खबर में विस्तार से आपको यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) के बारे में हर एक मुद्दे को बताएंगे.

क्या है यूनिफार्म सिविल कोर्ड?

समान नागरिक संहिता पूरे देश के लिये एक समान कानून के साथ ही सभी धार्मिक समुदायों के लिये विवाह, तलाक, विरासत, गोद लेने आदि कानूनों में भी एक जैसी स्थिति प्रदान करती है.

यूनिफार्म सिविल कोर्ड

इसका पालन धर्म से परे सभी के लिए जरूरी होता है. यानि साफ़ तौर पर हर एक कानून देश के हर धर्म जाती समुदायें के लिए एक बराबर है. कोई भी धर्म अपनी कानून का हवाला नहीं दे सकते साथ हीं उन्हें उचित पालन करना होगा.

क्या संविधान में यूनिफार्म सिविल कोर्ड प्रावधान है?

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि संविधान के अनुच्छेद 44 कहता है कि शासन भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिये एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की कोशिश करेगा.

संविधान में अनुच्छेद-44

अनुच्छेद-44 संविधान में वर्णित राज्य के नीति निदेशक तत्त्वों में एक है. यानि कोई भी राज्य अगर चाहे तो इसको लागू कर सकता है. संविधान उसको इसकी इजाजत देता है.

विरोध की आवाज

मुसलमानों की प्रमुख संस्था जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने देवबंद से इसके विरोध में आवाज बुलंद की है.
जमीयत ने कहा है कि UCC किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं होगा. मुसलमानों की प्रमुख संस्था का आरोप है कि समान नागरिक संहिता इस्लामी कायदे-कानून में दखलंदाजी होगी.

जमीयत उलेमा-ए-हिंद

इसी प्रस्ताव के बीच में जमीयत उलेमा ए हिंद के अध्यक्ष अरशद मदनी ने भी कहा कि ‘मुसलमान इस देश के गैर नहीं हैं…ये हमारा मुल्क है, मजहब अलग है लेकिन मुल्क एक है.

ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि एक देश में धर्म के हिसाब से अलग-अलग कानून क्या ठीक है? लोगों द्वारा सवाल ये भी उठा रहे हैं कि मुस्लिम संगठन या कुछ लोगों को समान नागरिक संहिता से आपत्ति क्या है? ऐसा क्या छिन जाएगा, जहाँ लगातार यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) समान नागरिक संहिता के खिलाफ एक पक्ष खड़े हो गए हैं?

मुस्लिम समुदाय के विरोध

मुस्लिम समुदाय के विरोध के पीछे क्या है वजह?

-मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और अन्य धार्मिक संगठनों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा इसलिए वे नहीं चाहते कि वे अप्रासंगिक हो जाएं.

-मुसलमानों के पक्ष के अनुसार यूनिफॉर्म सिविल कोड उनके धार्मिक मामलों में एक तरीके हस्तक्षेप या दखलंदाजी है. जबकि इसमें महिला और पुरुषों को समान अधिकार की बात है. इसका धर्म से कोई लेना देना नहीं है.

-समान नियम के खिलाफ मुस्लिम संगठन तर्क देते हैं कि संविधान में सभी को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार है और इसलिए वे इसका विरोध करेंगे, पर समझना यह है कि दुनिया के 125 देशों में एक समान नागरिक कानून लागू है.

-मुसलमान और इस्लामिक संगठन तर्क देते हैं कि महिलाओं को शरीयत में उचित संरक्षण मिला हुआ है. अगर ऐसा है तो उन्हें पुरुषों के बराबर अधिकार क्यों नहीं हैं.

-इस्लाम में मान्यता है कि उनका लॉ किसी का बनाया नहीं है, जबकि सब अल्लाह के आदेश के अनुसार चल रहे हैं. लेकिन कुछ चीजों लोगों को खटक रही हैं जैसे 9 साल शादी की उम्र क्या आज के समय में यह ठीक है?

-एक एक्सपर्ट कहते हैं कि बहुत कुछ स्थिति अब भी अस्पष्ट है. बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समुदाय के काफी लोग इससे अनजान हैं. लोग बिना जाने ही घबरा रहे हैं.

-विरोधी कहते हैं कि UCC से हिंदू कानूनों को सभी धर्मों पर लागू कर दिया जाएगा. जबकि इसका किसी एक धर्म से कोई लेना देना नहीं है. यह एक समानता की बात करता है.

-आर्टिकल 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता की बात करने वाले कहते हैं कि यह अधिकारों का उल्लंघन होगा.

-कुछ संगठन यह कहकर लोगों को बरगलाते हैं कि इसे सब पर थोप दिया जाएगा.

-सियासत में लोग यह कहकर मामले को हल्का करने की कोशिश करते हैं कि अब इसमें ज्यादा कुछ बचा नहीं है जो नया कानून बनाने की जरूरत हो. ये वही लोग हैं जो 370 को समाप्त किए जाने पर यह कह रहे थे कि अब उसमें कुछ बचा नहीं था.

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