UCC को लेकर विपक्ष मचा रहा बवाल! क्या देश को मिलेगा फिर से एक नया अधिकार?

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बीजेपी सरकार अपने वादों को पूरा करने के लिए UCC कानून पर भी मोहर लगाने की अर्ज़ी कर रही है, लेकिन आखिरकार क्यों विपक्ष इसपर सवाल कर रही है?

साल 2014 से जबसे केंद्र में बीजेपी की सरकार आई है, तब से देश के कानून में कई बदलाव देखने को मिल रहे हैं. जहां कश्मीर से आर्टिकल 370 को हटाया गया वही 3 तलाक को मूल रूप से ख़त्म कर दिया. जब बीजेपी की सरकार आयी थी, तब उन्होंने अपने घोषणा पत्र के ज़रिये 3 वादों को पूरा करने का संकल्प लिया था. जिसमे सबसे पहला राम मंदिर का था, दूसरा कश्मीर से आर्टिकल 370 को हटवाना और तीसरा UCC कानून. जिसे अब पूरा करने के लिए बीजेपी पूरा प्रयत्न कर रही है.

UCC को लेकर क्यों छिड़ी बहस?

देश में UCC कानून को लेकर बड़ी बहस छिड़ी है. जिसके बाद केंद्र ने देश की जनता से ही इस कानून को पारित करने के लिए जवाब माँगा है. लेकिन विपक्ष दल इसका विरोध करने में अपनी एड़ी-चोटी एक कर रही है. इसको सुनने के बाद आपके मन में ये चुनिंदा सवाल तो ज़रूर उठ रहे होंगे की, UCC क्या है ? सरकार इसे देश में क्यों लाना चाहती है? इससे क्या फायदे होंगे? विपक्ष इसपर क्यों बवाल मचा रही है? तो चलिए आज इस लेख के ज़रिये हम जानते हैं की पूरा मामला क्या है?

UCC कानून हमेशा से रहा बीजेपी का बड़ा मुद्दा

UCC कानून जो साल 1998 के चुनावों से ही UCC बीजेपी के सबसे बड़े मुद्दों में से एक रही है. बता दें की साल 2019 में नवंबर के महीने में नारायण लाल पंचारिया ने संसद में इस कानून को लेकर विधेयक पेश किया था. लेकिन विपक्ष के विरोधों के वजह से इसे अपनाया नहीं गया. जिसके बाद साल 2020 में किरोड़ी लाल मीणा ने फिर इस मुद्दे को उठाया था. लेकिन इसे संसद में नहीं भेजा गया था. वहीँ साल 2018 के परामर्श पत्र में ये स्वीकार किया गया की धर्म निरपेक्ष भारत में विभिन्न धर्मों के अंदर कुछ ऐसे प्रथाएं, और रस्मे हैं, जो महिलाओं में समानता के अधिकारों की अवहेलना करने का एक बड़ा कारक बनता है.

UCC क्या है?

UCC को समझने से पहले हमें अपने संविधान की बात करने चाहिए, जो की पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष है. हमारे संविधान के मुताबिक हर धर्म समान है. लेकिन इसी संविधान का आर्टिकल 44 कहता है की केंद्र सरकार UCC कानून को देश में ला सकती है. UCC का मतलब है “समान नागरिक सहिंता”. यूनिफार्म सिविल कॉर्ड ये कानून विवाह, तलाक, गोद लेने, विरासत और उत्तराधिकार जैसे मामलो के लिए बनाया जाएगा.

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बता दें की हमारे भारत में कई ऐसे धर्म है जिनके अंदर खुदका एक बड़ा कानून शामिल है, जिसके कानून के अनुसार वो अपने कार्य करते हैं. हमारे देश में एक लड़की की शादी कब होनी चाहिए उसके लिए एक उम्र निर्धारित है, जो की 18 वर्ष है. लेकिन कई ऐसे धर्म है जिनमे 18 वर्ष के निचे लड़कियों की शादी करना कोई अपराध या गैर कानूनी नहीं है. और इन अलग कानूनों की वजह से ही हमारे संवैधानिक कानून की पूर्ति नहीं हो पाती.

UCC क्या कहता है-

UCC कहता है की विवाह, तलाक, गोद लेने, विरासत और उत्तराधिकार जैसे मामलों में भी हर जाती, धर्म के व्यक्ति के ऊपर समान कानून लागू किया जाएगा. इस कानून के कारण हर व्यक्ति संवैधानिक तौर पर अपनी ज़िन्दगी जी सकेगा. फिर चाहे वो धर्म जाती का कोई भी मामला क्यों न हो.

UCC कानून इसीलिए है ज़रूरी…

साल 1985 में जब शाह बानो वाला मामला आया था, तब सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ी बात कही थी तलाक जैसे मामलो में मुस्लिम महिला के अधिकारों के संबंध में संसद को UCC पर ध्यान देना चाहिए. उन्होंने कहा था की UCC कानून एक ऐसा साधन है जो कानून के सामने राष्ट्रीय सद्भाव और समानता की परस्परता के पुल को बनाए रखें. बता दें की ईसाई धर्म में ईसाइयों का एक ऐसा कानून है जिसमे बताया गया है की महिलाओं को अपने बच्चों के ‘प्राकृतिक अभिभावक के रूप में मान्यता नहीं’ दी जाती है. और हिन्दू धर्म में ये है की अविवाहित महिलाएं भी अपने बच्चे की “प्राकृतिक रूप से अभिभावक” बन सकती हैं.

जिसमे साफ़ तौर पर देखा जा सकता है की एक देश में अलग अलग धर्मो के अलग अलग कानून है. जिस कारण बीजेपी भारत को ‘एक देश एक कानून” वाला देश बनाना चाहती है. जहां धर्मों के बीच अलग-अलग कानून न हो. सभी को एक ही कानून को मानना पड़े.

विपक्ष क्यों मचा रही है बवाल?

UCC कानून एक बड़ा ही सेंसिटिव सब्जेक्ट बन चूका है. जिसपर लगातर निशाना साध रही है. विपक्ष का कहना है की केंद्र सरकार अगर देश में “एक देश एक कानून” लाने की अगर बात करती है तो सभी धर्मों के लोगों को एक सामान कानून के भीतर रह कर अपने धर्म के कानून के बीच संतुलन बनाकर रखना काफी मुश्किल होगा. इस कानून के आ जाने से धर्म, जातीय स्तर पर बनाए गए कानूनों का खंडन हो जाएगा.

CONTENT: NIKITA MISHRA

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