दुनिया कि अजीबोगरीब महामारी, जहाँ डांस करते करते लोगों की हो जाती थी मौत

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डांस करते करते मर जाना, इसे डांसिंग प्लेग या डांसिंग डेथ कहा गया है

डांस करना हमारी जिंदगी का वो हिस्सा हैं, जहाँ ये किसी के लिए पैशन है तो कहीं इसे सेलिब्रेशन का सबसे अहम् हिस्सा माना जाता है. लेकिन यहीं डांस आज से करीबन 500 साल से भी ज्यादा समय पहले 400 लोगो की मौत का कारन बन गया था.

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डांस करने की वजह से मौत हो जाना यहाँ ये एक बिमारी मानी गई.
जहाँ सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर डांस करने से किसी की मौत कैसे हो सकती है?


तो यहां आपके हर उस सवाल का जवाब देंगे जो आपको ये साफ करता जायेगा की आखिर डांस करने वाले महामारी के पीछे क्या रहस्य और कैसे मिथ हैं. बताएंगे कि ये क्या होता है, साथ हीं इसकी शुरुआत कैसे हुई, और सबसे पहला मामला कहाँ से आया.


सबसे पहले आपको बता दें कि डांस करते करते मर जाना इसे डांसिंग प्लेग या डांसिंग डेथ कहा गया.

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महामारी की पहली शिकार

france के स्टारसबर्ग में 14 जुलाई 1518 को फ्राउ ट्रॉफी नाम की लड़की अचानक से जमकर नाचने लगी, सभी को लगा हो सकता है इसे कोई बड़ी ख़ुशी की खबर मिली हो इसलिए ये नाच रही है. लेकिन वो नाचने में ऐसी मशगूल हुई कि वो डांस करते-करते ही घर के बाहर गली में आ गई. होश खो बैठी लड़की को देखकर बहुत अजीब भी लगा. ऐसे हीं शाम हुई और लड़की बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ी.

फ्राउ ट्रॉफी

अगले दिन वो लड़की फिर उठी और एक बार फिर नाचने लगी. कई दिन ऐसे हीं बीते और उस लड़की के पैर भी नाचते नाचते फूल गए. और एक दिन अचानक उसकी मौत हो गई. इस घटना के दौरान देखते ही देखते 30 से अधिक लोग डांस करते-करते ऐसे मर ने लगे.
शहर दर शहर डांस करने के कारन मौतों के आकड़े आसमान छूने लगे. दहशत बढ़ गए.


बीमारी को लेकर अलग अलग तथ्य और दावें

आधुनिकता की कमी थी बीमारी का पता लगाने के लिए कई तरीके से काम किया गया. इस बिच डॉक्टर्स ने डांसिंग प्लेग को नेचुरल डिजीज बताया, जहाँ उनके मुताबिक शरीर में ब्लड टेम्परेचर बढ़ने से डांस करते हुये लोगो की मौत हो रही थी. लेकिन इसमें हर तथ्य को जोड़ते हुये, साफ किया गया कि ये थ्योरी फ्लॉप है.


जबकि इसमें अन्धविश्वास की बात सामने आई, इस तथ्य में कहा गया कि ये बीमारी संत वाइटस की वजह से हुआ जहाँ डांस करते हुये लोगो की मौत के पीछे इनका श्राप है. आगे बढे उससे पहले आपको बता दें कि संत वाइटस ईसाई धर्म के संत थे जिन्हे नाचगान वाला मनोरंजन करने वाले संत मन जाता रहा.

cross

रिपोर्ट्स के मुताबिक दावा किया गया कि वो भुत, प्रेत, और आत्माओं को एक शरीर से निकलाते थे. इसलिए जो डांस करते रहते उन्हें संत वाइटस के प्राथना स्थान पर लाया जाता.

क्रॉस को बीमार इंसान के हाथ पर लगाकर और पवित्र जल का छिड़काव कर उसे मुक्ति देने का प्रयत्न करने की कोशिश की जाती और दावा हुआ की इससे लोग ठीक हो रहे थे, हालाँकि लोग ठीक भी होते लेकिन ऐसे में दूसरे बीमार जो प्राथना स्थान पर नहीं आते वो भी ठीक हो रहे थे.

dancing pleague


वहीँ इससे परे एक तथ्य है कि उस वक़्त शोधकर्ताओं का मानना था की एर्गोट फंगी के टोक्सिन और सैकोजेनिक रिएक्शन की वजह से होता है, आपको सरल भाषा में समझाएं तो बता दें कि ये दरअसल रोटी बनाने वाले अनाजों में सड़े हुये दाने का जिक्र किया गया.

जिसकी वजह से लोगों में food poison की समस्या हुई और दावे अनुसार ये सीधे इंसानी दिमागी को असर करता था. और ये दिमाग में ड्रग्स की तरह असर करते हीं मानसिक संतुलन का बिगड़ने का कारन बना.

जिसकी वजह से hallucination मतलब मति भ्रम करते हीं लोगो का रिएक्शन लगातार डांस करना था. जहाँ लोग अलग तरीके से भी रियेक्ट करते. पर यहां भी इस थ्योरी पर सवाल खड़े हो गए. इसे जॉन वालर ने गलत थ्योरी बताया. उनका कहना था कि जिस इलाके से डांस करते हुये मौतों का सिलसिला शुरू हुआ वहां अन्धविश्वास का वास रहा. जहाँ भुखमरी और सूखा से घिरे हुये लोगों में यहां मानसिक समस्या पैदा हुई. लोग मेन्टल प्रॉब्लम से जूझ रहे थे. जहाँ मध्यकालीन युग में ऐसे कई मामले आये जहाँ मानसिक समस्या से जुडी दिक्कतें आईं.


ऐसे में एनालिसिस की बात करें तो बताया गया कि डांस करने वाले लोग जिन्होंने अपनी जान गवाई उनपर आत्माओं का वास था, वही कहा गया कि डांस करने वाले लोग धार्मिक पंथ के थे जिन्हे मोक्ष का रास्ता मिल गया था इसलिए डांस करते हुये लोग अपना होश गवा देते और उनकी मौत हो जाती.


डांसिंग प्लेग या डांसिंग डेथ की महामारी के राहस्य से कभी पर्दा नहीं उठ पाया। आज से 500 साल पहले भी किसी भी scientist को पता नहीं चल पाया कि आखिर इसका कारन क्या था? जहाँ आज भी इसकी सटीक जानकारी किसी भी तरीके से साइंस के पास नहीं है.


बता दें कि फ्रांस में महामारी के चलते 400 से ज्यादा लोगों की मौत का ताण्डव करीबन दो महीने तक चला.

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