स्वामी विवेकानंद जयंती विशेष – क्या स्वामी विवेकानंद इस्लाम धर्म से नफरत करते थे? क्या है सच?

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आज स्वामी विवेकानंद की 159 वीं जयंती मनाई जा रही है.12 जनवरी 1863 को जन्मे भारत के आध्यात्मिक गुरु के जन्मोत्सव पर हर साल इस दिन को राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है.राष्ट्रीय युवा दिवस युवाओं को समर्पित एक खास दिन है,जिहोने देश को एक नई और अहम दिशा दी.स्वामी विवेकानंद बहुत कम उम्र में ही संन्यासी बन गए थे.जहाँ पश्चिमी देशों को योग-वेदांत की शिक्षा से अवगत कराने के साथ साथ इसकी अहमियत का श्रेय स्वामी जी को ही जाता है.

दुनिया की प्रेरणा रहे भारत के आध्यात्मिक गुरु

आपको बता दे की स्वामी जी ने 19वीं शताब्दी के अंत में विश्व मंच पर हिंदू धर्म को एक मजबूत पहचान दिलाई थी. दरअसल स्वामी विवेकानंद का असली नाम नरेंद्रनाथ दत्त था,जिन्हें नरेन नाम से भी पुकारा जाता था.जहाँ एक ओऱ दूसरे बच्चो का ध्यान खेल कूद और शैतानियों में जाता था तो वही बहुत कम उम्र में ही स्वामी विवेकानंद का झुकाव अध्यात्म की तरफ हो गया था.अब जैसे की हर कोई ये बात जनता है की भारत से लेकर विदेशो में स्वामी विवेकानंद का डंका बजता था.साधारण से दिखने वाले स्वामी विवेकांनद के बुद्धमिता के चर्चे उस ज्ञान के भण्डार से रूप में फैले थे,की उनसे बोलने से पहले विदेशी हज़ार बार सोचते थे.उनकी हाजिर जवाबी और हर सवाल का जवाब देने की वजह से बड़े से बड़े महारथी स्वामी विवेकानंद को सलाम करते थे.पर इन सब एक ओर जहाँ प्रेरणादायक भारत के आध्यात्मिक गुरु खूबियों और ज्ञान की बाते होते हैं तो वही इस बीच ये बाते भी हो रही है की हिंदू धर्म को एक मजबूत पहचान दिलाने वाले स्वामी विवेकांनद इस्लाम धर्म से बेहद नफरत करते थे जहाँ वो मुस्लिम धर्म के खिलाफ एक धारणा रखते थे.तो आज रिपोर्ट में हम इसी ख़ास मुद्दे को लेकर आपको जानकारी देंगे.

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पूर्व प्रधानमंत्री ने किया था खुलासा

हम जिन महान व्यक्ति के बारे में आपसे बात कर रहे हैं,दरअसल उन्होंने भारत और हिन्दू धर्म के लिए कई बड़े और महत्वपूर्ण उपलब्धियां दिलवाई,उन्होंने रामकृष्‍ण मठ, रामकृष्‍ण मिशन और वेदांत सोसाइटी की नींव रखी थी.जहाँ स्वामी जी की बुद्धिमानी और तेज दिमाग का हर कोई कायल था.स्वामी विवेकानंद के विचार आज भी जीवंत हैं, इस दुनिया में ऐसा कोई नहीं जो स्वामी जी के ज्ञान को प्राप्त न करना चाहता हो.पर यहां इन सब में स्वामी विवेकानंद जो इतने गुणी,प्रसिद्ध और बेदाग़ महान व्यक्ति हैं उन्हें लेकर एक धारणा है जिसमें उन्हें मुसलमान विरोधी बताया जाता है. तो आपको बता दे की ये सरासर गलत और बेहद अपमानजनक आरोप है.इसका जिक्र खुद भारत के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अपनी किताब भारत की खोज में किया है.देश के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अपनी किताब भारत की खोज में इस धारणा को एक सिरे से खारिज किया है.

अपनी किताब में नेहरू ने स्वामी विवेकानंद की प्रशंसा करते हुए उनके एक पत्र का जिक्र किया है जो उन्होंने अपने एक मुस्लिम मित्र को लिखा था. पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू के अनुसार, अपने पत्र में स्वामी विवेकानंद ने लिखा था, ‘सच्चाई यह है किअद्वैतवाद धर्म और विचार का अंतिम शब्द है. यह एकमात्र ऐसी स्थिति है जहां कोई भी सभी धर्मों और संप्रदायों को प्यार से देख सकता है. हम मानते हैं कि यह भविष्य की प्रबुद्ध मानवता का धर्म है…दूसरी ओर हमारा अनुभव है कि यदि अनुभव है कि यदि कभी किसी अन्य धर्म के अनुयायी अपने व्यावहारिक जीवन में बराबरी के नजरिए के इस स्तर पर आते हैं तो वो सिर्फ इस्लाम और इस्लाम के हो सकते हैं. हमारी मातृभूमि में दो महान व्यवस्थाओं, हिंदुत्व और इस्लाम का मिलन है जहां दिमाग वेदांती और शरीर इस्लाम का है, यही एकमात्र उम्मीद की किरण है.’जहाँ अपने कम उम्र में ही प्रसिद्धि हासिल करने वाले महान स्वामी विवेकानंद ने इस पत्र में आगे लिखा था,’मैं अपने मन की आंखों से संपूर्ण भारत का भविष्य देख सकता हूं,जो इस अराजकता और संघर्ष से गौरवशाली और अजेय बनकर बाहर बाहर निकल रहा है.जिसका मस्तिष्क वेदांत और इस्लाम शरीर है.’बता दे की यह अनमोल पत्र को 10 जून 1898 जिसे अल्मोड़ा में लिखा गया था. 


विवेकशील स्वामी विवेकानंद अर्थहीन आध्यात्मिक चर्चाओं और तर्कों की निंदा करते थे,विशेष रूप से उच्च जातियों के छुआछूत वाले विचार की.जहाँ वो बराबर स्वतंत्रता और समानता की आवश्यकता पर जोर देते थे.उनका सन्देश कहता था की ‘विचार और कर्म की स्वतंत्रता ही जीवन,विकास और कल्याण ही एकमात्र शर्त है.भारत की एकमात्र आशा जनता से है.यहां का उच्च वर्ग शारीरिक और नैतिक रूप से मृत हैं.’
स्वामी विवेकानंद का निधन महज 39 साल की उम्र में हो गया था.जबकि इतने काम जीवन जीने वाले स्वामी विवेकानंद जी ने अमेरिका में आयोजित धर्म संसद में भारत का प्रतिनिधित्व किया और अपने अनमोल वचनों से सभी को प्रभावित किया।जिसे आजतक कोई नहीं भूल पाया.

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