‘सनातन के विरोध’ पर तमिलनाडु का कॉलेज घिरा! मद्रास हाई कोर्ट की टिप्पणी वायरल

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तमिलनाडु के एक कॉलेज में ‘सनातन का विरोध’ विषय में विचार रखने की बात की गई है. जिसके बाद ये मामला मद्रास हाईकोर्ट पहुंचा और सुनवाई हुई

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे के सनातन धर्म पर दिए विवादित बयान का लगातार विरोध हो रहा है. उदयनिधि के खिलाफ अबतक दिल्ली-यूपी और मुंबई तक एफआईआर दर्ज है. इसपर जमकर राजनीती भी की जा रही है. वहीँ तमिलनाडु सरकार में मंत्री उदयनिधि स्टालिन अपने बयान पर कायम हैं. इस विवाद के बिच तमिलनाडु के एक सरकारी कॉलेज के सर्कुलर ने मामले को बढ़ावा दे दिया है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक यहां सनातन के विरोध के विषय में विचार रखने की बात की गई है. जिसके बाद ये मामला मद्रास हाईकोर्ट पहुंचा और सुनवाई हुई.

क्या है पूरा मामला?

तमिलनाडु के तिरुवरुर जिले के एक सरकारी कॉलेज ने सनातन को लेकर ख़ास सर्कुलर जारी किया था. खबर अनुसार इसमें छात्रों को ‘सनातन का विरोध’ विषय पर अपने विचार साझा करने का आग्रह किया गया है. दरअसल ये विषय तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री अन्नादुराई की जयंती के अवसर पर बोलने के लिए दिया गया था. जिसे मद्रास कोर्ट में चुनौती दी गई थी.

मद्रास कोर्ट ने क्या कुछ कहा?

तमिलनाडु के सरकारी कॉलेज से निकले सर्कुलर की खबर वायरल होने के बाद हंगामा मच गया. कई लोगों ने विरोध किया. हाईकोर्ट में चुनौती मिलने के बाद इसपर जस्टिस एन शेषशायी की एकल पीठ द्वारा सनातन धर्म पर सुनवाई के दौरान टिप्पणी सामने आई है.
मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि हम सनातन धर्म पर अत्यधिक मुखर और शोर-शराबे वाली बहसों के प्रति सचेत हैं. सनातन धर्म शाश्वत कर्तव्यों का एक समूह है जिसे कई स्रोतों से लिया गया है. सनातन धर्म में राष्ट्र, राजा, प्रजा के प्रति कर्तव्य, अपने माता-पिता और गुरुओं के प्रति कर्तव्य, गरीबों की देखभाल आदि की बात की गई है. हैरानी है कि इन कर्तव्यों को क्यों नष्ट किया जाना चाहिए?

हाई कोर्ट ने पूछे सवाल

सनातन पर सुनवाई को लेकर मद्रास कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि चुने गए इन कर्तव्यों के स्तर पर परीक्षण किया जाता है, तो इसका मतलब ये होगा कि ये सभी कर्तव्य नष्ट होने योग्य हैं. क्या एक नागरिक को अपने देश से प्यार नहीं करना चाहिए? यहां जस्टिस एन शेषशायी की एकल पीठ ने अपने टिप्पणी में पूछा की क्या उसका अपने राष्ट्र की सेवा करना कर्तव्य नहीं है? क्या माता-पिता की परवाह नहीं की जानी चाहिए? जो कुछ भी हो रहा है, उसके प्रति वास्तविक चिंता के साथ, यह कोर्ट इस पर विचार करने से खुद को रोक नहीं सकी.

‘छुआछूत अब संवैधानिक नहीं’

मद्रास कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसा लगता है कि एक विचार ने जोर पकड़ लिया है कि सनातन धर्म पूरी तरह से जातिवाद और छुआछूत को बढ़ावा देने वाला है. लेकिन छुआछूत किसी भी तरह से अब बर्दाश्त नहीं की जा सकती. इस धर्म के भीतर या बाहर भी छुआछूत भी अब संवैधानिक नहीं हो सकती है. हालांकि दुःख की बात है कि ऐसा अब भी हो रहा है. जब धर्म से संबंधित मामलों में अभिव्यक्ति की आजादी का इस्तेमाल किया जाता है, तो यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि इससे किसी को ठेंस न पहुंचे. अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब हेट स्पीच नहीं हो सकती.

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